ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धारक- पुष्यमित्र शुंग

ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धारक- पुष्यमित्र शुंग
ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धारक- पुष्यमित्र शुंग

पुष्यमित्र शुंग

 !!! ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धारक- पुष्यमित्र शुंग !!!

हम सब यह जानते हैं कि मौर्य साम्राज्य ने प्रथम बार संपूर्ण भारत को एकीकृत कर एक अखिल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की, जिस की विशालता और शक्ति का पता हम इस बात से लगा सकते हैं कि मौर्य साम्राज्य की सीमा में वर्तमान इरान से लेकर बर्मा (म्यांमार) तक का संपूर्ण क्षेत्र शामिल था और जिस यूनानी शासक सिकंदर ने संपूर्ण विश्व को जीतने का सपना देखा था उसके उत्तराधिकारी शासक सेल्यूकस निकेटर को मौर्य शासक चंद्रगुप्त मौर्य ने बुरी तरह से पराजित किया । मौर्य साम्राज्य जितना विशाल था उतना ही वह शक्तिशाली भी था । विशाल सेना के बल पर मौर्यों ने जिस भारत का निर्माण किया उतना विशाल भारत ने तो गुप्त शासन में, न मुगलों के अधीन और ना ही अंग्रेजी शासन में बन पाया ।
इतने विशाल शक्ति संपन्न और उन्नत साम्राज्य में हर क्षेत्र में उन्नति हो रही थी, लेकिन जो एक क्षेत्र पिछड़ता जा रहा था वह था सनातन धर्म ।

 

ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धारक- पुष्यमित्र शुंग
ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धारक- पुष्यमित्र शुंग

मौर्य सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म को स्वीकार करने और वह त्रिरत्न (बुध-संघ-धर्म) में आस्था प्रकट करने के साथ ही भारत (विशेषत: उत्तर भारत) में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार आरंभ हुआ । अशोक ने बौद्ध धर्म को ना केवल सरंक्षण प्रदान किया बल्कि राजकीय धर्म भी घोषित कर दिया, जिसके साथ ही ब्राह्मण धर्म पिछड़ता चला गया लेकिन कुछ समय बाद ही एक बार फिर भारत में सनातन धर्म की पुनर्स्थापना हुई । एक नए साम्राज्य के साथ, एक नए शासन के साथ पुष्यमित्र शुंग जिसने अंतिम मगध सम्राट बृहद्रथ को मारकर एक बार फिर सनातन धर्म को स्थापित किया । 

 

शुंग कौन थे?

शुंग ब्राह्मण थे । पाणिनि ने अष्टाध्यायी में शुंगों को भारद्वाज गोत्र का बताया है और मालविकाग्निमित्र में इस वंश को कश्यप ब्राह्मण बताया है । अतः स्पष्ट है कि शुंग ब्राह्मण थे । पुष्यमित्र शुंग के पूर्वज मगध साम्राज्य में पुरोहित है लेकिन जब बोध धर्म का प्रभाव पाटलिपुत्र पर पड़ा तो इन पुरोहित ब्राह्मणों की दशा दयनीय होती गई और इन ब्राह्मणों ने सेना में काम करना शुरू किया अपनी योग्यता के आधार पर यह सेनापति के पद तक पहुंचे । इतिहास में हमें ऐसे कई वीर ब्राह्मण सेनापतियों का उल्लेख मिलता है द्रोणाचार्य अश्वत्थामा आदि।

पतन की ओर अग्रसर मगध साम्राज्य के अंतिम शासक बृहद्रथ (जिसे हर्ष चरित्र में प्रज्ञा दुर्बल कहा) था जो विलासिता उसे ना राज काज का पता था और ना ही सेना का । यवन सेना का खतरा उत्तर भारत पर मंडरा रहा था । यह स्थिति वैसी ही थी जैसे चंद्रगुप्त मौर्य के समय थी । बौद्ध धर्म की अहिंसा और बृहद्रथ की विलासिता की वजह से यूनानी सेना ने साकेत और मध्यमिका को जीत लिया भारत के लिए यह निश्चित रूप से अपमानजनक था और यही सब ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र सहन नहीं कर सका वह उचित अवसर का इंतजार कर रहा था और जल्द ही उसे यह अवसर मिला जब बृहद्रथ सेना का निरीक्षण कर रहा था तो पुष्यमित्र ने सेना के सामने उसकी हत्या कर दी । प्रजा और सेना ने इस कृत्य का किसी भी प्रकार से विरोध नहीं किया क्योंकि वह बृहद्रथ की विलासिता तथा बौद्ध धर्म की अहिंसा की वजह से और यवन सेना के भय से कांप रहे थे और उन्हें इंतजार था किसी सेनानायक जो पुष्यमित्र शुंग के रूप में भारतीय आभापटल पर उदय हुआ था ।

ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धारक- पुष्यमित्र शुंग

सम्राट बनने के बाद पुष्यमित्र ने सबसे पहले अश्वमेध यज्ञ करवाया था जो पतंजलि के निर्देशन में संपन्न हुआ । सम्राट पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञ करवाए थे । प्रथम राज्यारोहण के समय और दूसरा यूनानीयों को पराजित कर भारत से खदेड़ने के उपरांत । बौद्ध धर्म के प्रभाव में आकर क्षेत्रीय शासकों ने ब्राह्मण धर्म और चातुर्वर्ण्य व्यवस्था तथा ब्राह्मण सभ्यता एवं संस्कृति की मान्यताओं का त्याग कर दिया, उन सभी मान्यताओं और वैदिक परंपराओं का पुनर्जीवन शुंग शासन में मिला । मौर्य शासन के समय संस्कृत भाषा का महत्व लगभग समाप्त हो चुका था । इसका परिणाम यह हुआ कि जनता वेदों और वैदिक साहित्य को भुला चुकी थी । संस्कृत भाषा की जटिलता दूर करने तथा उसे सरलता से समझ जा सके इसलिए पुष्यमित्र शुंग के राजपुरोहित पतंजलि ने व्याकरण के ग्रंथ पाणिनि कृत अष्टाध्यायी समझाते हुए महाभाष्य की रचना की। ऐसा भी माना जाता है कि मनुस्मृति की रचना भी इसी समय हुई थी ।

पुष्यमित्र शुंग ने ब्राह्मण धर्म को राजधर्म और संस्कृत को राजभाषा की स्थिति पर पहुंचा दिया । वैदिक साहित्य और संस्कृति की पुनर्स्थापना कि जिस भारतीय संस्कृति को हम गुप्त काल में अपनी यौवनावस्था में देखते हैं उसी भारतीय संस्कृति की बाल्यकाल हमें शुंग कालीन संस्कृति में दिखाई देती है । शुंग शासकों ने यूनानी शासक (मिनांडर) से भारत की रक्षा की और प्राचीन वैदिक संस्कृति और ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान किया जिससे ब्राह्मण धर्म ने इस युग में बौद्ध धर्म का स्थान ग्रहण किया । मौर्य सम्राट अशोक के समय जो स्थान बौद्ध धर्म का था वही स्थान पुष्यमित्र शुंग के समय ब्राह्मण धर्म का हो गया ।
 पुष्यमित्र ब्राह्मण तंत्र का स्वामी था जिसका लक्ष्य ब्राह्मण धर्म के रक्षक होने के नाते यज्ञ आदि को प्रोत्साहन देकर वैदिक धर्म का पुनरुत्थान करना था, जो गुप्त सम्राटों के दीर्घकालीन शासन में चरम सीमा पर पहुंचा ।

ब्राह्मण धर्म का पुनरुद्धारक- पुष्यमित्र शुंग

!!! यह ब्लॉग आप को केसा लगा कमेंट कर के जरूर बताये और लाइक और शेयर करना न भूले !!!

    इसी प्रकार की जानकारी के लिए बने रहे हमारे साथ 

    आप की अपनी ब्लॉग :  spokenbirds  !!!

    

 

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *