1 श्री ऋषभ देवजी को हालरियो

प्रस्तुत कविताएं, जैन धर्म के प्रसिद्ध श्री हस्तीमल जी महाराज के प्रसिद्ध ग्रंथ हीरावली से लिए गए हैं, जिसका संपादन परम श्रद्धेय ज्योतिर्विद्या मालव रत्न पंडित श्री कस्तूरचंद जी म. सा. और संकलनकर्ता मधुर व्याख्यानी श्री हस्तीमल जी महाराज है।

1 श्री ऋषभ देवजी को हालरियो

मां मोरा देवी गावे रे हालरीयो
झूले म्हारा ऋषभ जी पालणे पधारियो ।माँ ।

रत्न जड़त लड लूमा रणकत,
इन्द्र सुधर्मा इण आगे धरियो ।माँ ! 1 ।

झूले न झुलावे माता मगल गावे,
निरख निरख नयना हिवड़ो ठरियो ।माँ ।2 ।

1 श्री ऋषभ देवजी को हालरियो

रिमझिम रिमझिम फिरत आँगणिये,
झनन झनन झनकार वाजे रे नेवरियो ।माँ ।3 ।

मां मोरा देवी गावे रे हालरीयो
झूले म्हारा ऋषभ जी पालणे पधारियो ।माँ ।

एक सहस्त्र आठ लक्षण बिराजे,
ओर नहा कोई ऐसो रे नानडियो ।मां ।4 ।

1 श्री ऋषभ देवजी को हालरियो

नगरी अयोध्या वसी रे भरत में
नाम वनिता माधव जी धारियो ।मां 151

रमत रमाँइ जग रीत बताई,
तीन लोक में यश विस्तरियो ।माँ । 6 ।

1 श्री ऋषभ देवजी को हालरियो

मां मोरा देवी गावे रे हालरीयो
झूले म्हारा ऋषभ जी पालणे पधारियो ।माँ ।

कहे हीरालाल जिनेन्द्र पद मोटो,
एक जिभ्यासयू गुण किम जाय करियो ।माँ ।7 ।

1 श्री ऋषभ देवजी को हालरियो

मां मोरा देवी गावे रे हालरीयो
झूले म्हारा ऋषभ जी पालणे पधारियो ।माँ ।

1 श्री ऋषभ देवजी को हालरियो

 

2 श्री सुधर्मा स्वामी का स्तवन 

स्वामी सुधर्माजीये वदिये मोटा छे दीन दयाल जी
पाट विराज्या महावीर के ते प्रभु करत निहाल जी

रूप मनोहर दिपतो औपता पूनमचन्द जी
चार सिंघ के यायेने दीपू-दीपू करत दिगंद जी

तीर्थकर के आगले गणधर रत्नारी मालजी
विनय करी ने प्रभू रीजवे बालबृध करे प्रतिपाल जी

श्री मुख सिद्धांत सौभली धरीया नहीं सदेश जी
रत्न भूषण जिम राखिया विचरत देश विदेश जी

स्वामी सुधर्माजीये वदिये मोटा छे दीन दयाल जी
पाट विराज्या महावीर के ते प्रभु करत निहाल जी

गाम नगर पुर पाटणे तारता बहु नरवार जी
श्री जिन धर्म दीपावता सफल करे अवतार जी

संयम तप ब्रह्म माहे ने धीर गुणा का भण्डार जी
लज्जा दया गुण पुरीया करण चरण का पारजी

अमृत वाणी मुख उच्चरे नर सुर मुणत बखाण जी
चौदा पूर्व चार ज्ञान का सर्व अक्षर ना जाण जी

स्वामी सुधर्माजीये वदिये मोटा छे दीन दयाल जी
पाट विराज्या महावीर के ते प्रभु करत निहाल जी

गुण सिन्धु स्वामी आपका केम लहे नर पारजी
चरम सागर अमर तणो उड़ता न आवे निस्तार जी

एक सो वर्ष नो आयूषो अर्ध पाल्यो संयम भार जी
आठ वर्ष केवल प्रजा पछे पहोंता मोक्ष मझार जी

स्वामी सुधर्माजीये वदिये मोटा छे दीन दयाल जी
पाट विराज्या महावीर के ते प्रभु करत निहाल जी

गुण गाया गुणधर तणा पुज्यजी के प्रशाद जी
नित-नित होज्यो महारी वंदणा रत्नपुरी अहलाद
जी
संवत उन्नीस एकावने भादव सुदी द्वितीया चंद जी
‘हीरालाल ‘ हर्ष भाव से सुणतां उपजे आणंद जी

स्वामी सुधर्माजीये वदिये मोटा छे दीन दयाल जी
पाट विराज्या महावीर के ते प्रभु करत निहाल जी

 

3 वक्ता गुण पद
ज्ञानी गुरु बिन कौन सुनावे वाणी… ज्ञानी

निष्पक्ष न्याय करे सो ही सतगुरु ,
सांची साँची बात कहें तानी । ज्ञानी ।1।

ज्ञानी गुरु बिन कौन सुनावे वाणी… ज्ञानी
क्षीर नीर मिल्यो हंस के आगे ,
न्याय करत जिम छानी छानी । ज्ञानी ।2।

ज्ञानी गुरु बिन कौन सुनावे वाणी… ज्ञानी
आत्म गुप्त इन्द्री को जीते ,
अश्रव रोकण कहे कहानी । ज्ञानी ।3।

ज्ञानी गुरु बिन कौन सुनावे वाणी… ज्ञानी
ऐसा गुण धारक गुरु तारक,
पार उतारे पुरुषा दानी ।ज्ञानी ।4।

ज्ञानी गुरु बिन कौन सुनावे वाणी… ज्ञानी
गुण सत्ताइस रीस न आवे ,
सह परिसह सब काल जानी ।ज्ञानी। ।5।

ज्ञानी गुरु बिन कौन सुनावे वाणी… ज्ञानी
हीरालाल कहे गुरु गुणवता ,
पार उतारे भव जल पानी । ज्ञानी ।6।

ज्ञानी गुरु बिन कौन सुनावे वाणी… ज्ञानी
ज्ञानी गुरु बिन कौन सुनावे वाणी… ज्ञानी

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