मानव जाति का इतिहास

मानव जाति के इतिहास

मानव जाति के इतिहास  की बात की जाए तो हमें अतीत में आज से 560000 साल पीछे जाना पड़ेगा तब सुदूर अफ़्रीका में ऐसे प्राणियों ( होमिनिड ) का उदय हुआ जिन्हें हम मानव कह सकते है । अपनी  उत्पत्ति से ही आदिमानव कई रूपों में समय के साथ – साथ  बदलता गया । आज हम जिस रूप में है ऐसे मानव की  उत्पत्ति आज से लगभग 160000 साल पहले हुई और लगभग 8000 ईसापूर्व तक के मानव को एक नजर देखा जाए तो हमें यह पता चलता है कि मानव ने सभ्यताओं के निर्माण करने से पहले ” आदिम सभ्यता ”  में ही लाखों साल बिताए आपसी संघर्ष , मार – काट, शिकार करके, पेड़ – पौधों से फल खाकर अपना आदिम जीवन बिता रहे था फिर उसने आग का अविष्कार किया , पहिये का आविष्कार, औजार बनाना और आपस मे बातचीत करना (इशारो में), जानवरों ओर आसपास की वस्तुओं को पहचानने के लिए चिन्हों का अविष्कार किया था  और इसी तरह मानव अपने परिवेश के अन्य जानवरों के अलग होता गया और नई नई जगह पर उसने घूमना आरंभ किया कारण कुछ भी हो – भौगोलिक बदलाव, जनसंख्या का एक ही जगह ज्यादा जमाव , खाने की कमी या कुछ और । मानव आगे से आगे बढ़ता गया
समय के एक बड़े काल खंड के बाद पेड़ों और गुफाओं को छोड़ समतल भूमि पर अपना स्थाई निवास  बनाया , शिकार और कंद-मूल की जगह खेती करना जानवरो को पालना और नदियों के किनारे बस्तियों में रहना आरम्भ कियाऔर अपनी सभ्यताओं के निर्माण किया
पुरातात्विक खोजो के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मानवीय सभ्यताओं का निर्माण नदीघाटियों में ही हुआ और बहुत ही विशाल, समृद्ध और विकसित सभ्यताओं के निर्माण किया था = मेसोपोटामिया, यूनान, मिश्र, रोम, चीन और हड़प्पा आदि । इन सभ्यताओं की अपनी बनावट ओर बसावट थी और अपनी अपनी विशेषताएं थी लेकिन इन सब मे जो सबसे अलग, विशाल, प्राचीन, समृद्ध और सुनियोजित तरीके से बसी हुई थी, वो सिंधुघाटी सभ्यता थी । इस सभ्यता में विशाल नगरों का सुनियोजित तरीके से निर्माण किया गया था, जो इतिहास में अन्ये किसी भी  सभ्यता में देखने को नही मिलता है।

सिंधुघाटी सभ्यता
भारत उन प्राचीनतम सभ्यताओं में सबसे प्रचीन है जहां मानव में प्रथम बार स्थाई निवास किया था । सिंधुनदी की घाटी में बसने के कारण इसे सिंधुघाटी सभ्यता के नाम से जाना जाता है। इसी सभ्यता में 8000 ईसापूर्व (आज से 10000 साल पहले) मेहरगढ़ (बलूचिस्तान) में नवपाषाणकालीन बस्तियों के अवशेष मिले है। यहां पर मानव के प्रथम स्थाई निवास और नगर निर्माण के पद चिन्ह आज से 7000 हजार साल पहले के है लेकिन 3950 ईसापूर्व (6000 साल पहले) ये महान नगर अपने अस्तित्व में आये। जिनमे मोहिंजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा और लोथल जैसे विशाल नगर थे । इस सभ्यता का उत्कर्ष काल 3250 ईसापूर्व से 2750 ईसापूर्व तक माना जाता है, और इस के बाद ये सभ्यता धीरे-धीरे नष्ट होती चली जाती है जो 1500 ईसापूर्व यह पूर्णतयः इतिहास के पन्नो में दफन हो जाती है ।

सिंधु घाटी की सभ्यता को ” काँस्य युगीन सभ्यता” भी कहते है क्योंकि इन्होंने टिन (अफगानिस्तान) और तांबा (राजस्थान) को मिलाकर कांसा बनाने की तकनीक विकसित कर ली । सिंधु सभ्यता के काल को विश्व कर नगरीकरण का आरंभिक काल भी कहते है क्योंकि इसी समय  हड़प्पा, मोहिंजोदड़ो और कालीबंगा जैसे महान नगरों का निर्माण  यहीं हुआ
सर्वप्रथम अंग्रेज इंजीनियर अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1853 में हड़प्पा की एक मुहर देखी थी लेकिन खुदाई का कार्य 1921 मे आरम्भ हुआ।
1921 में राय बहादुर दयाराम साहनी ने वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के बाईं ओर हड़प्पा नगर की खोज की इस कारण इसे “हड़प्पा सभ्यता” भी कहते है
1922 में राखालदास बनर्जी ने सिंध प्रांत के लरकाना जिले में सिंधु नदी के दाहिने तट पर मोहनजोदड़ो के खंडहरों की खोज की इस नगर में सबसे विशाल ईमारत एक स्नानघर है जो एक विशाल भू भाग में फैला है जिसकी लंबाई 12 मीटर चौड़ाई 7 मीटर और गहराई 2.5 मीटर है
मोहनजोदड़ो नगर से ही मशहूर कांस्य नर्तकी की प्रतिमा मिली है

मानव जाति का इतिहास

विशेष

विश्व में सर्वप्रथम कपास की खेती सिंधु सभ्यता के मेहरगढ़ में 5000 ईसापूर्व में आरंभ की गई ।
सैंधव समाज मातृसत्तात्मक था ।
सिंधु लिपि में 64 मूल वर्ण ओर 250 से 400 तक चिन्ह या चित्र थे ।यह लिपि चित्रात्मक (Pictographic) भावचित्रात्मक (Ideographic) थी  जिसे लिखने का तरीका गोमुत्रिका (Boustrophedon) था इस लिपि को अभी तक पढ़ा नही जा सका ।
मोहिंजोदड़ो शब्द का शाब्दिक अर्थ है “मुर्दो का टिल्ला” और कालीबंगा का अर्थ है “काली चूड़ियां” है ।
प्रकृति की प्रजनन शक्ति के रूप में सिंधु वासी लिंग ओर योनि की पूजा करते थे
स्वस्तिक, क्रोस, एवं चक्र आदि चिन्ह सैंधव लोगो की देन है।

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