भारतीय शिक्षा और शिक्षा पद्धति

भारतीय शिक्षा और शिक्षा पद्धति
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भारतीय शिक्षा और शिक्षा पद्धति

 
भारत विश्व की सबसे प्राचीनतम सभ्यता है और विश्व में सबसे पहले जिस देश में शिक्षा को ग्रहण किया था या जिसमें शिक्षा की शुरुआत की थी वह भारत ही था । हमें देखने को मिलता है कि भारतीयों ने प्राचीन काल में सिंधु घाटी सभ्यता या वैदिक सभ्यता में बहुत ही ऐसे ग्रंथों की रचना की है जो शिक्षा पर आधारित है । प्राचीन काल मे मनुष्य की नैतिकता और शिक्षा को ही सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता था और इसी लिए शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों की स्थापना की जैसे तक्षशिला नालंदा आदि और न केवल विश्वविद्यालयों की स्थापना की बल्कि कई नगर तो शिक्षा के लिए ही जाने जाते थे जैसे काशी, नालन्दा, विक्रमशिला, वल्लभी, तक्षशिला, कन्हेरी, वैशाली, मिथिला, प्रयाग और अयोध्या । इनके अलावा दक्षिणी भारत मे भी ऐसे ही बहुत से शिक्षा के प्रसिद्ध केंद्र थे ।
 ये परम्परा जो वैदिक काल मे शुरू हुई वो मौर्य से लेकर वर्धन काल तक लगातार चली आयी और दक्षिण भारत मे  शिक्षा का विस्तार सर्वाधिक चोल शासको के समय हुआ । शिक्षा का माध्यम अलग अलग समय मे अलग अलग भाषाओं में था, लेकिन उत्तर भारत मे संस्कृत को ही मुख्य रूप से अपनाया गया और इसी प्रकार दक्षिण भारत मे तमिल को ।
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ये परम्परा हजारो सालो तक ऐसे ही अविरल बनी रही समय के अलग अलग काल खण्डों में शिक्षा के उद्देश्य और माध्यम बदलते गये । प्राचीन काल में जो शिक्षा मनुष्य की नैतिकता और संस्कारों के लिए दी जाती थी उत्तर मध्यकाल में उसका उदेश्य धर्म प्रचार का हो गया और ब्रिटश सरकार ने शिक्षा को एक हथियार के रूप में प्रयोग किया भारतीयों को मानसिक रूप से गुलाम बनाने के लिए । प्राचीन काल मे शिक्षा का माध्यम संस्कृत, पाली और प्राकृत था जो उत्तर मध्यकाल में अरबी, फ़ारसी और उर्दू कर दिया । ये ही  क्रम हमे ब्रिटिश काल मे भी देखने को मिलता है, अंग्रेजो ने भारत में अंग्रेजी भाषा का प्रचार प्रसार किया ।
जैसे जैसे भारतीय शिक्षा के माध्यम और उद्देश्य बदलते गए वैसे वैसे भारतीय शिक्षा की गुणवत्ता भी बदलती गयी। शासक वर्ग अपने धर्म और विचारों को महत्व देते थे वो अपनी भाषा ओर लिपि से भी प्रेम करते थे जैसे जैसे राजनीतिक पृष्टभूमि बदली वैसे वैसे ही भाषा की व्यवहारिकता भी बदलती जाती।

भारतीय शिक्षा और शिक्षा पद्धति

 प्राचीन काल में जो शिक्षा आरम्भ हुई वह  हजारों सालों तक इसी परिपाटी पर चलती रही थी और हजारों साल बाद जब तक अंग्रेज भारत में नहीं आए तब तक थोड़े बहुत बदलावों के साथ ऐसा ही सब कुछ चलता रहा था । अंग्रेजों के आने के बाद इसमें कुछ बदलाव शुरुआत में तो आए थे, लेकिन वह बहुत थोड़े थे, जिनका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था, लेकिन लार्ड बेबिंगटन मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा की शुरुआत भारत में की थी और उसी के साथ ही भारत में प्राचीन शिक्षा का समापन शुरू हो गया था । न केवल शिक्षा बल्कि संपूर्ण भारत में शिक्षा पद्धति को ही बदल दिया गया था प्राचीन गुरुकुल के स्थान पर नई अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय खोले जाने लग गए थे । भारतीय जो शिक्षा पद्धति थी उसको बंद करने पर जोर दिया और अंग्रेजी शिक्षा पद्धति पर जोर देना शुरू किया था । भारतीयों को पहली बार नौकरी के लिए पढ़ाया जाना शुरू किया गया था । प्राचीन काल के जो शिक्षा के महत्व थे- नैतिकता, धर्म, ज्ञान, संस्कार आदि को त्याग कर अब नोकरी का ही महत्व रह गया । अब उन्हें सरकारी मुलाजिम बनने के लिए पढ़ाया जाना शुरू किया गया था इससे पहले जो हमारी शिक्षा पद्धति थी उसमें गुणवत्ता थी व्यक्ति को शिक्षित किया जाता था लेकिन पहली बार हमारी जो शिक्षा पद्धति है उसका उद्देश्य ने केवल नैतिकता बल्कि उसका जो मुख्य उद्देश्य है वह नौकरी रख दिया गया था। अंग्रेज ये सोचते थे  कि भारतीय लोग अंग्रेजी पढ़ेंगे तो अंग्रेजों के नौकर रहेंगे और वही परंपरा उस टाइम से लेकर के आज तक लगातार जारी है, आज भी हमारी शिक्षा का उद्देश्य समाज सेवा या नैतिकता या संस्कार या देश से सम्बंधित ज्यादा कुछ भी नहीं है, आज हमारी जो शिक्षा का उद्देश्य है वह एकमात्र है सरकारी नौकरी पाना ।

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