ब्रिटिश काल में लिखा गया “भारत का इतिहास”

ब्रिटिश काल में लिखा गया "भारत का इतिहास"
ब्रिटिश काल में लिखा गया "भारत का इतिहास"

ब्रिटिश काल में लिखा गया “भारत का इतिहास” 

“बचपन में भारत का इतिहास पढ़ता था । मुझे प्रतिदिन सिकंदर से क्लाइव तक लगातार युद्धों में भारत की पराजय तथा अपमान की कथाओं के नाम तथा तिथियाँ याद करनी पड़ती थी। राष्ट्रीय लज्जा के इस रेगिस्तान में यदि कोई हरियाली है तो वह है स्वतंत्रता पर मर मिटने वाले राजस्थान के रणबाकुरों का कार्य ।” रविंद्र नाथ टैगोर

इस कथन को हम न केवल राजस्थान के बल्कि भारत के संदर्भ में भी अगर देखें तो यह सही है ।
ब्रिटिश काल में लिखा गया "भारत का इतिहास"
ब्रिटिश काल में लिखा गया “भारत का इतिहास”

हमारा इतिहास किसने लिखा ?

भारत में लेखन कला की परंपरा बहुत पुरानी है, शुरुआत वैदिक काल में धार्मिक ग्रंथों से हुई जो आगे चल कर बहुत से रूपो में देखने को मिलती है । कई बार यह ग्रंथ पूर्ण ओर इतिहास को समेटे हुए थे तो कुछ ग्रन्थ बिना तिथि के आंकड़े मात्र थे कभी राजाश्रय में लिखे गए तो कभी स्वतंत्र । भाषा, लिपियां,साम्राज्य, राजनीतिक परिस्थितियां और क्षेत्रीय विविधता के बावजूद लेखन का यह महायज्ञ सदियों तक अविरल चलता रहा । मगध हो या मुगल या ब्रिटिश साम्राज्य लेखन कला में साहित्यिक प्रगति होती रही। कभी ये अशोक के शिलालेखों में राजाज्ञा के रूप में देख सकते है तो कभी मध्ययुगीन शाही आदेशो में, कभी मुग़ल फरमानों में तो कभी अंग्रेजी कंपनी के स्वार्थों में । इन्ही सब के बीच छुपी हुई थी ब्रिटीश शासन की खुद को श्रेष्ठ समझने की भावना । आज के इस ब्लॉग में हम इन्हीं अंग्रेजो के स्वार्थ पूरित भावनाओं के बारे में पढ़ेंगे !!!

हमारा इतिहास लिखने वाले ज्यादातर लोग जिन्होंने शुरुआत में  भारत का इतिहास लिखा था वह अंग्रेज थे । मेक्समूलर, विंसेंट स्मिथ, कर्नल टॉड, जॉन मार्सल, जेम्स मिल, सर विलियम जोन्स आदि। अंग्रेजों ने भारतीय इतिहास का जो लेखन किया है वह तथ्यों और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर किया था लेकिन जैसा कि वह अंग्रेज थे और उस समय भारत में अंग्रेजी शासन था तो इन्होंने अंग्रेजी मान्यताओं अंग्रेजी शासन और अंग्रेजी मूल्यों को ध्यान में रखते हुए भारतीय श्रेष्ठता को इंगित करने वाले तथ्यों को इन्होंने छोड़ दिया था । “हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया” में जेम्स मिल ने भारतीय इतिहास का मूल्यांकन इस दृष्टिकोण के साथ किया ताकि वह प्रमाणित कर सके कि अंग्रेजों की भारत पर विजय थी वह उचित थी। इस संदर्भ में इनकी कटु आलोचना न केवल भारतीयों ने बल्कि ब्रिटिश लेखकों ने भी की । इस पुस्तक के संबंध में ऑक्सफोर्ड में संस्कृत के प्रथम प्रोफेसर एचएच विल्सन ने लिखा “इस पुस्तक का रुझान धृष्टता पूर्ण है।”

इसी प्रकार “अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया” में विंसेंट स्मिथ ने भारत में औपनिवेशिक शासक को उचित ठहराया है ।

अंग्रेजों ने न केवल भारतीय इतिहास को बल्कि मूल देश या आर्यों की उत्पत्ति की विचार धारा तक को प्रभावित किया और एक नई विचारधारा आर्यों की उत्पत्ति के स्थान पर आर्यों का आगमन को जन्म दिया । सर विलियम जॉन्स और मैक्स मूलर के प्रयासों से भारतीय मूल देश और विरासत की मान्यता का जन्म हुआ भारत के आर्यों को यूरोपीयनों का बंधु माना जाने लगा था इस विचार को कुछ उच्च वर्गीय भारतीयों ने भी स्वीकार किया, जबकि मैक्स मूलर ने कभी भारत के दर्शन तक नहीं किए फिर भी उन्होंने (अंग्रेजों) इस मान्यता को इतना प्रचारित किया कि भारतीय जनमानस के अंदर आर्यों की उत्पत्ति स्थल के बजाय आर्यों का आगमन का भ्रम पनपने लगा । इन्ही अंग्रेजों ने सिकंदर को महान घोषित किया अगर भूमि को जीतना और दहशत फैलाना ही महानता है तो फिर चंगेज खान और तैमूर लंग सबसे महान है । सिकंदर के बारे में यह तो बताया जाता है कि वह महान था उसने पोरस को हराकर भी उसका राज्य लौटा दिया, लेकिन सिकंदर ने यह विजय कैसे प्राप्त की यहां अंग्रेज इतिहासकार मौन है, जबकि एरियन ने इन “एनाबेसिस” (सिकंदर के अभियान का इतिहास) में लिखा है –

“अंतिम निर्णायक लड़ाई में तीस हजार पैदल और चार हजार अश्वरोहियों ने भाग लिया, उसमें से तीन सौ रथों और दो सौ हाथियों का प्रयोग किया । एक छल भरे तरीके को अपनाकर ही सिकंदर पुरु के व्यूह को भंग कर पाया और विजय प्राप्त की ।”

इस कपट विजय के साथ सिकंदर का विजय रथ रुक गया उसके सैनिकों की हिम्मत नहीं हुई कि वह आगे बढ़े और पोरस के राज्य से कई गुना बड़े मगध साम्राज्य से युद्ध लड़े और मजबूरन सिकंदर को भारत से वापस यूनान लौटना पड़ा । इसी प्रकार “अस्सकेनों ” की राजधानी “मस्सग” में भी सोते हुए सात सौ वीर सैनिकों को महान सिकंदर ने मौत के घाट उतार दिया ।

 

भारत में सिकंदर का विजय चक्र ही नही थमा बल्कि उसका जीवन चक्र भी रुक गया। पंजाब के मालव कबीले पर उसने हमला किया जहां युद्ध के दौरान उसकी छाती में गहरा घाव लग गया, तीर का प्रहार इतना भयंकर था कि तीर उसके कवच को तोड़कर उसकी पसलियों में जा धंसा, उस समय तो वह बच गया पर आगे चलकर वही घाव उसकी मृत्यु का कारण बना । सिकंदर को बेहोश देखकर मकदुनी सेना घबरा उठी और कत्लेआम पर उतारू हो गई । उस नगर में उन्होंने स्त्रियों और बच्चों तक का कत्ल कर दिया। (यह मालव जाति इस बर्बर कत्ले आम के बाद पंजाब से राजस्थान में आ कर बस गयी।)

ऐसी और भी बहुत सी घटनाएं हैं जो सिकंदर के अभियान की बर्बरता को दर्शाती है लेकिन अंग्रेज विद्वानों ने अपनी प्राचीनता को श्रेष्ठ बताने के लिए उन घटनाओं को दबा दिया । भारतीयों के लिए यह जरुर लिखा कि आपसी फूट और संघर्ष से वह हार गए लेकिन यह बताना जरूरी नहीं समझा कि वह भारतीय वीर थे स्वतंत्रता प्रेमी थे और अपनी मातृभूमि से प्रेम करते थे ।

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